All Kumar Vishwas Poetry

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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Jang lambi hai mil ke saath raho sach walo!
Aakhir mulk hai sabka to fikr sabki hai

-Kumar Vishwas

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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‎"तुम्ही पे मरता है ये दिल,अदावत क्यों नहीं करता ?
कई जन्मों से बंदी है,बगावत क्यों नहीं करता ?
कभी तुमसे थी जो,वो ही शिकायत है ज़माने से,
मेरी तारीफ़ करता है, मोहब्बत क्यों नहीं करता .....?"

Tumhein pe marta hai ye dil, adavat kyun nahin karta?
Kayi janmo se bandi hai, bagawat kyun nahin karta?
Kabhi tumse thi jo, wo hi shikayat hai jamane se
Meri tareef karta hai, mohabbat kyun nahin karta?

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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बेक़रारी सी बेक़रारी है ,
वस्ल हैं और फिराक तारी है
जो गुज़ारी न जा सकी हम से
हम ने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है
बिन तुम्हारे कभी नहीं आई
क्या मेरी नीँद भी तुम्हारी है ?
उस से कहियो की दिल की गालियों में
रात-दिन तेरी इंतजारी है............................"

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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Unki khairo-khabar nahin milti
Humko hi khaaskar nahin milti
Shayari ko nazar nahin milti
Mujhko tu hi agar nahin milti
Rooh mein , Dil mein, Jism mein duniya,
Dhoondta hoon magar nahin milti
Log kehte hai rooh bikti hai,
Main jidhar hoon idhar nahin milti


उनकी खैरो-ख़बर नही मिलती,
हमको ही ख़ासकर नही मिलती !
शायरी को नज़र नही मिलती ,
मुझको तू ही अगर नही मिलती!
रूह में,दिल में,जिस्म में दुनिया,
ढूंढता हूँ मगर नही मिलती !
लोग कहते हैं रूह बिकती है ,
मैं जिधर हूँ उधर नही मिलती ........!"

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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Gum mein hoon ya hoon shaad mujhe pata nahin
Khud ko bhi hoon yaad mujhe khud pata nahin
Main tujh ko chahta hoon magar maangta nahin
Maula meri muraad mujhe khud pata nahin

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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ख़्वाब इतने तो दगाबाज़ न थे मेरे कभी ?
ख्व़ाब इतनी तो मेरी नीँद नहीं छलते थे ?
रात कि बात क्या इक दौर में ये ख़ानाबदोश
दिन निकलते ही मेरे साथ-साथ चलते थे,
मैं इन्हें जब भी पनाहों में जगह देता हुआ
अपनी पलकों की मुडेरों पे सजा लेता था ,
पूरा मौसम इन्ही ख्वाबों की सुगंधों से सजा
मेरे चटके हुए नग्मों का मज़ा लेता था ,
कुछ हवाओं के परिंदे इन्ही ख़्वाबों में लिपट
चाँद के साथ मेरी छत पे आ के मिलते थे ,
ये आँधियों को दिखा कर मुराद
और ये आज की शब इनकी हिमाकत देखो
इतनी मिन्नत पे भी ये एक पलक-भर ना रुके,
इनकी औकात कहाँ ?ये है मुकद्दर का फ़रेब
इतनी जिल्लत कि मेरे इश्क़ का दस्तार झुके,
ये भी दिन देखने थे आज तुम्हारे बल पर
ख़्वाब कि मुर्दा रियाया के भी यूँ पर निकले
तुम्हारी बातें, निगह, वादे तो तुम जैसे थे
तुम्हारे ख्वाब भी तुम जैसे ही शातिर निकले .....

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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Sach ke liye lado mat saathi
Bhaari padta hai
Jeevan bhar jo lada akela,
Bahar-andar dukh jhela
Pag-pag par kartavya-samar mein,
Jo prano ki baazi khela,
Aise sanki kotwal ko, chor dapt:ta hai
Sach ke liye lado mat saathi, bhaari padta hai
Kirno ko daagi batlaana,
Ya darpan se aankh churaana
Keechad mein dhans kar auron ko
Ganga ji ki raah bataana
Is sab se hi andhkaar ka, sooraj chadta hai
Sach ke liye lado mat saathi, bhaari padta hai


"सच के लिए लड़ो मत साथी
भारी पड़ता है..................!
जीवन भर जो लड़ा अकेला,
बाहर-अन्दर का दुःख झेला,
पग-पग पर कर्त्तव्य-समर में,
जो प्राणों की बाज़ी खेला,
ऐसे सनकी कोतवाल को,चोर डपटता है.....!
सच के लिए लड़ो मत साथी,भारी पड़ता है...!
किरणों को दागी बतलाना,
या दर्पण से आँख चुराना,
कीचड में धंस कर औरों को,
गंगा जी की राह बताना,
इस सब से ही अन्धकार का,सूरज चढ़ता है...!
सच के लिए लड़ो मत साथी,भारी पड़ता है.....!"

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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Mann tumhara!
Ho gya
To ho gya...
Eh tum the
Jo sada se archna ke geet the
Eh hum the
Jo sada se dhaar ke vipreet the
Gramya-savr
Kaise kathin aalaap niymat saadh paata,
Dwaar par sankalp ke
Lakhkar prajya kampkampaata
Ksheen sa svar
Kho gaya to, kho gya
Mann tumhara
Ho gaya
To ho gya
Laakh naache
Mor sa mann laakh tan ka seep tarse
Kaun jaane
Kis ghadi tapti dhraa par megh barse
Ansune chaahe rahein
Tan ke sajag shehri bulaave
Praan mein utre magar
Jab srishti ke aadim shlaave
Beej baadal
Bo gaya to, bo gaya
Mann tumhara
Ho gaya
To ho gaya

Kavita In Hindi Font

मन तुम्हारा !
हो गया
तो हो गया .....
एक तुम थे
जो सदा से अर्चना के गीत थे,
एक हम थे
जो सदा से धार के विपरीत थे.
ग्राम्य-स्वर
कैसे कठिन आलाप नियमित साध पाता,
द्वार पर संकल्प के
लखकर पराजय कंपकंपाता.
क्षीण सा स्वर
खो गया तो,खो गया
मन तुम्हारा!
हो गया
तो हो गया..........
लाख नाचे
मोर सा मन लाख तन का सीप तरसे,
कौन जाने
किस घड़ी तपती धरा पर मेघ बरसे,
अनसुने चाहे रहे
तन के सजग शहरी बुलावे,
प्राण में उतरे मगर
जब सृष्टि के आदिम छलावे.
बीज बादल
बो गया तो,बो गया,
मन तुम्हारा!
हो गया
तो हो गया........

-Kumar Vishwas

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Re: All Kumar Vishwas Poetry

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" मरुस्थल-सा प्यासा हर पल-सा बीता-बीता
कब तक हम भोगेंगे जीवन रीता-रीता
धरती के उत्सव में,चंदा में,तारों में
गीतों में,ग़ज़लों में,रागों मल्हारों में
गूंजेंगी कब तक धुन बिछुरन के भाव की
कैसे ऋतु बीतेगी अपने अलगाव की..??

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